
दिल में बरसात की चाह
हर दिन एक आस
कि अब घिरें काली घटाएं
अपनी ठंडी बूंदों से
समस्त भूतल को भिगो जाएं
घनघोर घटा कुछ ऐसी छाए
बूढ़े, बच्चों और जवानों को भी
रिमझिम बारिश राहत दे जाए
किसानों की दुआओं में भी
है सिर्फ आजकल पानी
मानसून में आई देरी से
सरकार का भी निकल रहा है ‘पानी’
नीलगगन में ना आई ग़र बदली
संसद में छा जाएगी
विपक्ष करेगा पानी-पानी
सरकार फिर झल्लाएगी
कब बुझेगी धरती की प्यास
कब हरी होगी
मेरे आंगन की घास
सड़क पर पड़े हैं हाथ फैलाए
प्राण हैं निकलने को
त्राहि माम कर रहे
दो बूंद तेरी पाने को
कहीं फसल तो कहीं प्रेयसी
राह देखती प्रियतम की अपने
अब तो आओ बरखा रानी
बनाओ सुबह और शाम सुहानी...