Thursday, April 1, 2010

एक तलाश: तुझमें अपनी

सफर शुरू होने से
मंज़िल पर पहुंचने तक
खुद को अकेला ही पाता हूं
बीच राहों में
अकेले चलते, तन्हा भटकते
तेरे निशां पाता हूं
जाने क्यूं मैं सदा
अपने अस्तित्व को
तुझमें तलाशता हूं
जाने क्यूं तुझमें
अपना ही अक्स
मैं अक्सर ढूंढा करता हूं
पाता भी हूं
हां ! पाता भी हूं
खुद को
तुझ में
लेकिन
पाकर भी
तुझमें खुद को
मैं नहीं खुद को तुझमें पाता हूं...

12 comments:

  1. vikas ye photo rajnish ka hai kya.

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  2. kuch rahe esi hoti hai jin par akela hi chalna hota hai. samjhe

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  3. tumhara dil tut gaya hai kya? ya phir kisi bhoot ka jikr kar rahe ho.

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  4. "पाता भी हूं
    खुद को
    तुझ में
    लेकिन
    पाकर भी
    तुझमें खुद को
    मैं नहीं खुद को तुझमें पाता हूं..."

    kya baat hai ji...
    kunwar ji,

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  5. जाते जाते भावनाओं का ज्वालामुखी फूटने वाला है लगता है....विचार करो इस पर....कह डालो अब।

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  6. बहुत अच्छा..भावपूर्ण रचना...

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  7. बहुत से गहरे एहसास लिए है आपकी रचना .

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  8. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  9. अच्छा प्रयास ....स्वागत है ....!!

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